इस लिए कहा जाता है मेजर ध्यानचंद को हॉकी का जादूगर…..

Aazad Staff

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जापान में खेले गए सन 1936 हॉकी टूर्नामेंट को देखने के लिए खूद हिटलर भी मैदान में मौजूद था।

मेजर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद के राजपूत घराने में हुआ। ध्यानचंद को चाहने वाले 'दद्दा' भी कहकर पुकारा करते थे। मात्र 16 साल की उम्र में वे भारतीय सेना में भर्ती हो गए थे।मेजर ध्यानचंद को फुटबॉल में पेले और क्रिकेट में ब्रैडमैन के बराबर माना जाता है। जब वे हॉकी लेकर मैदान में उतरते थे तो गेंद इस तरह उनकी स्टिक से चिपक जाती थी जैसे वे किसी जादू की स्टिक से हॉकी खेल रहे हों।

सुनने में अजीब लगता है, लेकिन लोगों का वाकई में ऐसा मानना था कि ध्यानचंद की हॉकी स्टिक में जादू था क्योंकि जब-जब मैच के दौरान उनके पास बॉल आती फिर उसे पोल पार करने से कोई रोक ही नही सकता था। हॉलैंड में एक मैच के दौरान हॉकी में चुंबक होने के शक में उनकी स्टिक तोड़कर देखी गई थी। जापान में एक मैच के दौरान उनकी स्टिक में गोंद लगे होने की बात भी कही गई लेकिन उनके खिलाफ हुई सारी जांचें निराधार साबित हुईं।

मेजर ध्यानचंद ने 14 साल की उम्र में पहली बार उन्होंने हॉकी स्टिक थाम ली थी। 21 साल की उम्र में उन्हें न्यूजीलैंड जानेवाली भारतीय टीम में चुन लिया गया। इस दौरे में भारतीय सेना की टीम ने 21 में से 18 मैच जीते।

1936 के बर्लिंग ओलंपिक खेलों में भारतीय हॉकी टीम फाइनल में पहुंच चुकी थी। जहां उनका मुकाबला था जर्मनी से इस यादगार मुकाबले को देखने के लिए मैदान में 40,000 लोग मौजूद थे। इस यादगार मुकाबले को देखने के लिए हिटलर भी मैदान मे मौजूद था। इस मैच में मेजर ध्यानचंद ने 1, 2 नहीं बल्कि 6 गोल किए थे। अपने टीम की ऐसी हार को देख हिटलर मैदान से पहले ही चल गया था। भारत ने ये ओलंपिक 8-1 से जीता था।

मेजर ध्यानचंद के इस शानदार प्रदर्शन को देखते हुए हिटलर ने उनसे मुलाकात की और पूछा जब हॉकी नहीं खेलते हो तो क्या करते हो मेजर ध्यानचंद ने बढ़े ही गर्व के साथ कहां कि मैं आर्मी में लांस नयक के पद पर हूँ, तब हिटलर ने मेजर ध्यानचंद को कहा कि जर्मनी आ जाओं मैं तुमको फील्ड मार्शल  बना दूंगा। इस ऑफर का ध्यानचंद ने बड़ी शालीनता से जवाब देते हुए कहा ‘भारत मेरा देश है और मैं वहां बहुत खुश हूं’। भरतीय सेना के इस छोटे से सिपाही के जावाब के आगे दुनिया का कुख्यात तानाशाह भी चुप हो गया था।

ध्यानचंद ने तीन ओलिम्पिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया तथा तीनों बार देश को स्वर्ण पदक दिलाया। भारत ने 1932 में 37 मैच में 338 गोल किए, जिसमें 133 गोल ध्यानचंद ने किए थे। दूसरे विश्व युद्ध से पहले ध्यानचंद ने 1928 (एम्सटर्डम), 1932 (लॉस एंजिल्स) और 1936 (बर्लिन) में लगातार तीन ओलंपिक में भारत को हॉकी में गोल्ड मेडल दिलाए।ध्यानचंद एक ऐसे खिलाड़ी थे जो ना केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध थे। वियना में ध्यानचंद की चार हाथ में चार हॉकी स्टिक लिए एक मूर्ति लगी है। भारत में मेजर ध्यानचंद के जन्मदिन को राष्ट्रीय खेल के रुप में मनाया जाता है।

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