महर्षि पतंजलि जिन्होंने दुनिया को दिया योग का ज्ञान

Aazad Staff

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महर्षि पतंजलि एक महान चकित्सक थे इन्हें कुछ विद्वान 'चरक संहिता' का प्रणेता भी मानते हैं। इतना ही नहीं पतंजलि रसायन विद्या के विशिष्ट आचार्य थे- अभ्रक, विंदास, धातुयोग और लौहशास्त्र इनकी ही देन है। राजा भोज ने इन्हें तन के साथ मन का भी चिकित्सक कहा था।

महर्षि पतंजलि भारत के प्रतिष्ठित विद्वानों में से एक हैं। पतंजलि को शेषनाग का अवतार भी माना जाता है। इनके जन्म के विषय में कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता है। हालांकि कुछ प्रमाणों के अनुसार पतंजलि ऋषि पाटलिपुत्र के राजा पुष्यमित्र शुंग के समकालीन (१८५ से ६३ ईसा पूर्व) के माने जाते हैं। वहीं कुछ विद्वानों का मानना है कि इनका जन्म गोनारद्य (गोनिया) में हुआ था लेकिन कहते हैं कि ये काशी में नागकूप में बस गए थे। यह भी माना जाता है कि वे व्याकरणाचार्य पाणिनी के शिष्य थे।

इनके जन्म को लेकर कुछ मत भी है कहा जाता है कि पतंजलि का जन्म स्वयं अपनी माता के अंजुली के जल के सहारे धरती पर नाग से बालक के रूप में प्रकट हुए थे। माता गोणिका के अंजुली से पतन होने के कारण उन्होंने इनका नाम पतंजलि रखा। इनको शेषनाग का अवतार माना जाता है।

महर्षि पतंजलि अपने तीन प्रमुख कार्यों के लिए विख्यात हैं। १- व्याकरण की पुस्तक 'महाभाष्य' के लिए । २- "पाणिनि अष्टाध्याई का टीका" लिखने के लिए ३- सबसे प्रमुख 'योग शास्त्र यानी कि (पतंजलि योग सूत्र) की रचना के लिए ये विशेष रूप से जाने जाते हैं।

पतंजलि एक प्रख्यात चिकित्सक और रसायन शास्त्र के आचार्य माने जाते है। रसायन विज्ञान के क्षेत्र में अभ्रक, धातुयोग और लौह्शास्त्र का परिचय कराने का श्रेय पतंजलि को जाता है।इनको योगशास्त्र के जन्मदाता की उपाधि भी दी जाती हैं। जो हिन्दू धर्म के छह दर्शनों में से एक है।

योग की ऐसे किया स्थापित -

पतंजलि ही पहले और एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने योग को आस्था, अंधविश्वास और धर्म से बाहर निकालकर एक सुव्यवस्थित रूप दिया था। इन्होंने योग के १९५ सूत्रों को स्थापित किया। जो योग दर्शन के आधार स्तंभ हैं। इन सूत्रों के पढ़ने की क्रिया को भाष्य कहा जाता है। महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग की महत्ता का प्रतिपादन किया है। जिसका जीवन को स्वस्थ रखने में विशेष महत्त्व है। इनके नाम इस प्रकार हैं – यम, नियम, आसन, प्राणायाम,प्रत्याहार, ध्यान, धारणा,समाधि। वर्तमान में योग के ३ ही अंग प्रचलन में हैं- आसन, प्राणायाम और ध्यान।

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