क्या आप जानते है लाल किले पर ही क्यों फहराया जाता है तिरंगा?

Aazad Staff

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लाल किले का नाम पहले 'किला-ए-मुबारक' हुआ करता था। इसका डिजाइन उस्ताद अहमद लाहौरी ने बनाया था। यह किला यमुना नदी के किनारे स्थित है।

भारत में 1947 से लेकर अब तक स्वतंत्रता दिवस के मौके पर दिल्ली के लाल किले पर प्रधानमंत्री द्वारा तिरंगा फहराया जाता हैं, लेकिन क्या आप ये जानते है कि लाल किले पर ही भारतीय झंडा क्यों फहराया जाता है? आज हम आपके साथ इससे जुड़ी कुछ जानकारी साझा करने जा रहे है …

लाल किला हमारे देश की ऐतिहासिक इमारतों की सूची में शुमार है। साल 1639 में मुगल बादशाह शाहजहां ने लाल किले का निर्माण करवाया था। लाल किले का निर्माण साल 1638 में शुरू हुआ था इसे बनकर तैयार होने में पूरे 10 साल लगे थे।इस किले को लाल पत्थरों से निर्मित किया गया है और इसी वजह से इसका नाम लाल किला पड़ा। इसकी दीवारें ढाई किलोमीटर लंबी और 60 फुट ऊँची हैं। यमुना नदी की ओर इसकी दीवारों की कुल लंबाई 18 मीटर और शहर की ओर 33 मीटर है। एक समय था, जब इस किले में 3000 लोग एक समूह में रहा करते थे, परंतु अंग्रेजी हुकुमत के दौरान  क़िले पर ब्रिटिश सेना का क़ब्ज़ा हो गया, और कई रिहायशी महल नष्ट कर दिये गये।

भारत में अंग्रेजी हुकुमत के दौरान प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सन् 1857 के तहत आजादी के मतवालों पर कहर ढहाने के लिए इस भव्य किले के कई हिस्सों को अंग्रेजो ने जमींदोज कर वहां   दफ्तर बना दिया। कह सकते है कि उस दौर में अंग्रेजों ने लाल किले को ब्रिटिश सेना का मुख्यालय बना लिया था।

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इसके साथ ही ब्रिटिश सेना ने किले को रोशन करने वाले मुगल सल्तनत के आखिरी बादशाह बहादुरशाह जफर को कैद कर लिया और यहां रखा बेशकीमती हीरा जिसे हम कोहिनूर के नाम से जानते है उस पर कब्जा कर लिया। अंग्रेजी हुकुमत ने बादशाह बहादुरशाह जफर पर लगभग 40 दिनों तक मुकदमा चलाया और अंत में उन्हें देश से निकाले जाने की सजा दी गई जिसके बाद उन्हें रंगून भेज दिया गया।

लाल किले में कई स्वतंत्रता सेनानियों पर भी मुकदाम चलाया गया था क्यों कि लाल किला उस समय की सबसे महत्वपूर्ण इमारतों में से एक था। लाल किले की इसी महत्वत्ता को देखते हुए आजाद भारता का तिरंगा यहां सबसे पहले फाहराया गाया था।

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने सबसे पहले लाल किले पर ही आजादी का ऐलान किया था। इसके बाद से ही लाल किला भारतीय सेना का गढ़ बन गया और 22 दिसंबर 2003 को इस ईमारत को भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग को सौंप दिया था।

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