सी. वनमती, चरवाहे से आईएस बनने तक का सफर, जाने कैसे किया पूरा

Aazad Staff

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सिविल सर्विस एग्‍जॉम 2014 में पास हुए सी. वनमती 3 बार आईएएस का एग्‍जॉम दे चुकी थीं, लेकिन वह बार-बार असफल होती रहीं। लेकिन आखिरकार चौथी बार उनको सफलता मिल ही गई।

लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती कोशिश करने वालों की हार नहीं होती नन्ही चीटी जब दाना लेकर चलती है चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है मन का विश्वाश रगों मे साहस भरता है चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती, कोशिश करने वालों की हार नहीं होती। हरिवंश राय बच्चन की प्रेरणा देने वाली इस कविता का जीता जागता उदाहरण है आइएएस सी. वनमती, जिन्होने कभी भी हार नहीं मानी। तो आईये जानते है उनकी सफलता की कहानी।

आईएएस बनने वाली वनमती गरीब परिवार से तालुक रखती है।इनका परिवार तमिल नाडु के छोटे से गांव ‘इरोड’ में पशु-पालन का काम करता था।वनमती का बचपन भी जानवरों को चराते हुए ही बीता था, लेकिन उनमें पढ़ाई को लेकर रुझान हमेशा से था। पिता परिवार का खर्च चलाने के लिए ड्राइवर की नौकरी करते थे।

सी. वनमती, को आईएएस बनने की प्रेरणा उनके ज़िला के कलेक्टर, से मिली थी। जिन्हें वे अक्सर युवा और बुजुर्ग सबसे एक-सा सम्मान पाता देखती थी। उनकी दूसरी प्रेरणा सिरियल  ’गंगा यमुना सरस्वती' से मिली जिससे वे इतनी प्रभावित हुई की उन्होने फैसला कर लिया की वो एक आईएएस  ही बनेंगी। 12 कक्षा पास करने के बाद वनमति ने  UPSC में सलेक्शन से पहले कंप्यूटर एप्लीकेशन में PG किया और एक प्राइवेट बैंक में नौकरी करने लगी थी।

साल 2015 से पहले भी तीन बार वनमती ने यूपीएससी के लिए प्रयत्न किया पर हर बार कुछ अंक के फ़ासले से वह चूक गयीं। फिर भी बिना हताश हुए उन्होंने अपनी मेहनत जारी रखी और साल 2015 में आखिरी लिस्ट के लिए चुने गए 1,236 प्रतिभागियों में अपनी जगह बना ली।हालांकि ये सफलता पूरी तरह से हाथ भी नहीं लगी थी कि सी. वनमति, के पिता की तबियत इतनी बिगढ़ गई की उन्हे अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। अपने पिता की देखभाल करते हुए ही वनमती ने इंटरव्यू की तैयारी कर सफलता हाशिल की। इन्हे 152वीं रैंक मिला था।

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